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बड़ा वो नहीं, जो किसी को छोटा महसूस कराए ( Humanity First Campaign)

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Introduction: Our Ego and Society क्या किसी इंसान का पद, उसका पैसा या उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा किसी दूसरे इंसान के बुनियादी आत्मसम्मान (Dignity) से बड़ी हो सकती है? इसका सीधा और सच्चा जवाब है— बिल्कुल नहीं। लेकिन आज का समाज इस सच से आंखें मूंदे बैठा है। अक्सर देखा जाता है कि जब कोई व्यक्ति जीवन में थोड़ा सा भी सफल या बड़ा बन जाता है, तो वह दूसरों को छोटा महसूस कराने लगता है। लोग जब किसी की मजबूरी में मदद करते हैं, तो उसे इस तरह जताते हैं जैसे उन्होंने कोई बहुत बड़ा अहसान कर दिया हो। यह लेख किसी किताबी ज्ञान पर नहीं, बल्कि हमारे समाज की उस कड़वी हकीकत पर आधारित है जिसे हम हर रोज सड़कों पर देखते हैं, नजरअंदाज करते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। हमें यह समझना होगा कि मदद करना कोई अहसान नहीं, बल्कि एक इंसान का दूसरे इंसान के प्रति स्वचालित कर्तव्य (Automatic Duty) है। समाज का हर नागरिक, चाहे वह किसी भी हाल में हो, इस देश का हिस्सा है और एक मूल्यवान संपत्ति (Asset) है। 1. Helping Is Our Duty, Not a Favour जब हम किसी जरूरतमंद को कुछ देते हैं और हमारे मन में यह विचार आता है कि ...

ज़िंदगी मेरी आंखों से -


इंसान तब नहीं रोता जब वह तकलीफ़ में होता है।

वह तब रोता है, जब वह अपनी तकलीफ़ बता नहीं पाता, समझा नहीं पाता, कोई सुनने वाला नहीं होता, और उसे कुछ समझ नहीं आता कि वह क्या करे।

जब दर्द हद से ज़्यादा बढ़ जाता है, तो वह सिर्फ़ आँसुओं के ज़रिए उसे बाहर निकालने की कोशिश करता है।

तो रोना उतना भी बुरा नहीं है, क्योंकि यह आपका दिल हल्का कर देता है।

पर जिसकी वजह से आप रोते हो... हमेशा यह याद रखना कि वह आपकी नज़र में, आपके दिल और दिमाग़ में कभी माफ़ नहीं होना चाहिए। उसे कभी माफ़ मत करना।

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