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बड़ा वो नहीं, जो किसी को छोटा महसूस कराए ( Humanity First Campaign)

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Introduction: Our Ego and Society क्या किसी इंसान का पद, उसका पैसा या उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा किसी दूसरे इंसान के बुनियादी आत्मसम्मान (Dignity) से बड़ी हो सकती है? इसका सीधा और सच्चा जवाब है— बिल्कुल नहीं। लेकिन आज का समाज इस सच से आंखें मूंदे बैठा है। अक्सर देखा जाता है कि जब कोई व्यक्ति जीवन में थोड़ा सा भी सफल या बड़ा बन जाता है, तो वह दूसरों को छोटा महसूस कराने लगता है। लोग जब किसी की मजबूरी में मदद करते हैं, तो उसे इस तरह जताते हैं जैसे उन्होंने कोई बहुत बड़ा अहसान कर दिया हो। यह लेख किसी किताबी ज्ञान पर नहीं, बल्कि हमारे समाज की उस कड़वी हकीकत पर आधारित है जिसे हम हर रोज सड़कों पर देखते हैं, नजरअंदाज करते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। हमें यह समझना होगा कि मदद करना कोई अहसान नहीं, बल्कि एक इंसान का दूसरे इंसान के प्रति स्वचालित कर्तव्य (Automatic Duty) है। समाज का हर नागरिक, चाहे वह किसी भी हाल में हो, इस देश का हिस्सा है और एक मूल्यवान संपत्ति (Asset) है। 1. Helping Is Our Duty, Not a Favour जब हम किसी जरूरतमंद को कुछ देते हैं और हमारे मन में यह विचार आता है कि ...

जब विकास दिखता ज़्यादा है, होता कम है!



मान लीजिए आज मेरी सैलरी 50 हज़ार है और अगले महीने 1 लाख हो जाती है — तो यह तरक्की है।

लेकिन अगर अगले 10 साल बाद भी मेरी सैलरी 1 लाख ही होती है, तो यह तरक्की नहीं है, यह सिर्फ़ inflationary growth है, जो हर चीज़ में अपने-आप लागू हो जाती है।

आज हमारा देश अर्थव्यवस्था, उत्पादन और सेवा उद्योग में जिस स्तर पर है, वहाँ तक पहुँचने में दशकों लगे हैं। यह एक ऐसा stage है जो दिखने में भले ही बड़ा लगे, लेकिन इसकी गति बहुत धीमी रही है। अगर हम अपने संसाधनों — जैसे tourism, manpower और बाकी सभी क्षेत्रों — को asset value बनाकर, हर social और contemporary factor को ध्यान में रखते हुए सही निर्णय लेते, तो आज हम कहीं और खड़े होते।

आज जिन देशों को हम अपने से आगे देखते हैं, वे कभी न कभी उसी जगह पर थे जहाँ आज हम हैं। Foreign countries हमसे आगे हैं — इसका कोई एक कारण नहीं है, बल्कि कारणों का पूरा set है।

हमारे देश में stability ज़्यादातर slow growth में रही है। जो growth हमें rapid दिखाई जाती है, वह असल में rapid नहीं है। वह हमें इसलिए तेज़ लगती है क्योंकि दुनिया काफ़ी speed से आगे बढ़ रही है, और हम तुलना में थोड़ा तेज़ महसूस कर रहे हैं।
देश के हालात ऐसे क्यों हैं और ऐसे क्यों रहे — इसके पीछे कई कारण हैं।

मान लीजिए मैंने कोई गलती की और consequences के बाद उसे सुधारा। तो यह पूरी संभावना है कि वही गलती मुझसे दोबारा भी हो सकती है।

सब कुछ हमारे सामने है, फिर भी हम न ठीक से देख रहे हैं, न सोच रहे हैं। हम बस यही सोचते रहते हैं कि हमारे पास क्या है और हम कर ही क्या सकते हैं। हम मान लेते हैं कि एक अकेले इंसान के बोलने, या दो-चार लोगों के चिल्लाने से क्या होगा।

ज़रूरत इस बात की है कि हम यह सोचना छोड़ें कि हम क्या नहीं कर सकते, और यह समझें कि अगर हम चाहें तो सब कुछ संभव है।
आज कम से कम हम इतने मजबूत तो हो चुके हैं कि Emergency जैसी कोई चीज़ दोबारा थोपना आसान नहीं है।

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