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बड़ा वो नहीं, जो किसी को छोटा महसूस कराए ( Humanity First Campaign)

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Introduction: Our Ego and Society क्या किसी इंसान का पद, उसका पैसा या उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा किसी दूसरे इंसान के बुनियादी आत्मसम्मान (Dignity) से बड़ी हो सकती है? इसका सीधा और सच्चा जवाब है— बिल्कुल नहीं। लेकिन आज का समाज इस सच से आंखें मूंदे बैठा है। अक्सर देखा जाता है कि जब कोई व्यक्ति जीवन में थोड़ा सा भी सफल या बड़ा बन जाता है, तो वह दूसरों को छोटा महसूस कराने लगता है। लोग जब किसी की मजबूरी में मदद करते हैं, तो उसे इस तरह जताते हैं जैसे उन्होंने कोई बहुत बड़ा अहसान कर दिया हो। यह लेख किसी किताबी ज्ञान पर नहीं, बल्कि हमारे समाज की उस कड़वी हकीकत पर आधारित है जिसे हम हर रोज सड़कों पर देखते हैं, नजरअंदाज करते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। हमें यह समझना होगा कि मदद करना कोई अहसान नहीं, बल्कि एक इंसान का दूसरे इंसान के प्रति स्वचालित कर्तव्य (Automatic Duty) है। समाज का हर नागरिक, चाहे वह किसी भी हाल में हो, इस देश का हिस्सा है और एक मूल्यवान संपत्ति (Asset) है। 1. Helping Is Our Duty, Not a Favour जब हम किसी जरूरतमंद को कुछ देते हैं और हमारे मन में यह विचार आता है कि ...

इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है


दुनिया बदलने की शुरुआत अक्सर वहीं से होती है, जहाँ हम किसी एक अनजान इंसान का दर्द अपना समझ लेते हैं।

सिर्फ़ भीख देना समाधान नहीं, बल्कि किसी को भीख माँगने की आवश्यकता ही न पड़े, यही सबसे बड़ा प्रयास है।

उनसे बचने की बजाय अगर हम उन्हें ऐसा करने देने से बचाने की कोशिश करेंगे, तो ज्यादा अच्छे नतीजे आएंगे।

अगर कोई भी व्यक्ति इस प्रकार स्टेशन या मंदिरों में मिलते हैं, तो सबसे पहली चीज़ हमें अपना नज़रिया उनके लिए सम्मानजनक रखना चाहिए, क्योंकि आखिर है तो वो भी इंसान ही। बस उन्हें वैसा उनके हालातों ने, अन्य समस्याओं ने बनाया होगा।

जब भी हमें ऐसा कोई दिखे, तो उन्हें कुछ पैसे देने की बजाय हम उन्हें खुद खाना खिलाकर, उन्हें कहीं भी कोई भी ऐसा कार्य दिला सकते हैं, जिससे ऐसे लोग सशक्त हो सकें। क्योंकि शिक्षा, अर्थ और जीविका के उचित साधनों की आवश्यकता उन्हें भी होती है।

हम जिस समाज में खुद को शिक्षित और सभ्य मानकर चलते हैं, उसी समाज में एक वर्ग इस प्रकार की दयनीय स्थिति का सामना कर रहा होता है। और हद तब होती है, जब हमें उन्हें नफरत और घृणा की दृष्टि से देखना सीखा दिया जाता है।

और ये सब देखना हमारे लिए इतना सामान्य हो गया है कि हमें इनसे कोई फर्क नहीं पड़ता। आखिर इतनी संवेदनहीनता क्यों?

समस्या ये है कि हमारे पास इतना वक़्त नहीं है कि हम उनके लिए कुछ करें। छोटे-छोटे बदलावों से बड़े बदलाव की शुरुआत होती है। अगर हम सब उनके प्रति जो नकारात्मक नज़रिया है, उसे बदलकर एक सकारात्मक शुरुआत स्वयं से करेंगे, तो हालात बेहतर हो सकते हैं।

अब इसमें भी प्रॉब्लम ये है कि आप सोचेंगे, एक अकेले के प्रयास से क्या होगा? पर ये प्यार एक अकेले इंसान की ज़िंदगी बेहतर बना सकता है।

हमें किसी की ज़िम्मेदारी नहीं लेनी है। इतना महान बनना ही किसको है? पर हम उनके जीवन को इस स्तर से बदलने के लिए अपने स्तर पर एक छोटी शुरुआत कर सकते हैं।

हम उन्हें खाना खिला सकते हैं। इन भूखे लोगों को अगर आप 10 रुपये का एक प्लेट नाश्ता भी करा दें, तो ये हमारे होटल में दिए 50–100 रुपये की टिप से अधिक मूल्यवान होगा। मैं आपको टिप न देने के लिए नहीं कह रहा हूं।

उनका सम्मान करें, क्योंकि समाज का नागरिक तो वो भी है। कोई भी काम अच्छा या बुरा नहीं होता, पर हालात तो बदले ही जा सकते हैं। और ये काम हम सब मिलकर कर सकते हैं।

आजकल लोगों की सोच बदल चुकी है। ज़माना बदल चुका है। अब लोग सच में जागरूक होने लगे हैं। बस ज़रूरत है इस स्थिति को बदलने के लिए प्रयास करने की। अरे बाबा, पूरी दुनिया की नहीं, सिर्फ़ इनकी। अपने स्तर पर जितना हो सके, हम इनके लिए कुछ करने का प्रयास कर सकते हैं।

हमें एक-दूसरे की सोच की इतनी फिक्र होती है कि अगर आप स्टेशन पर किसी ऐसे व्यक्ति के पास जाकर उसका हालचाल पूछेंगे, तो लोग हमें क्या सोचेंगे। पर वो लोग... उनके दर्द की तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते।

हमें मंदिरों पर, शादियों में, हजारों रुपए चढ़ाना, खाना बर्बाद करना मंजूर होता है, पर उन्हें पैसों से बारिश से बचने के लिए एक छाता देना मंजूर नहीं। बर्बाद हो रहे खाने को बचाने के लिए हमें किसी असहाय को बुलाना मंजूर नहीं।

ईश्वर कौन है? आपके अंदर की श्रद्धा, विश्वास। और चढ़ावा किसे चढ़ाते हैं? ईश्वर के नाम पर मंदिर के पुजारियों को।

अगर हम जरूरतमंद और असहाय लोगों की सहायता करेंगे, तो ईश्वर की सच्ची सेवा होती है। मंदिर में तो अपनी श्रद्धा से कितना भी चढ़ाएं, वो एक ही फल, नारियल, कितनी बार मंदिर से वहां संचालित दुकानों तक जाता और आता है। पर एक भी फल यूं लोगों को नहीं मिलता, जिन्हें सच में भूख लगी होती है। यद्यपि मंदिर और अन्य संस्थाएं इस प्रकार के लोगों और समाज के लिए भोजन से लेकर आवास तक की व्यवस्थाएं भी करती हैं, जो अत्यंत प्रशंसनीय है।

जीवन की सार्थकता इन छोटी शुरुआतों से और सुशोभित हो जाएगी।

बाकी सब तो सबकी अपनी सोच और समझ पर निर्भर करता है।

जितने भी लोग ऐसे असहाय हैं, हमें पता है उनका ये काम उनके हालातों की वजह से है। और ये सिर्फ़ उनकी असमर्थता और मजबूरी होती है, जिसके लिए उन्हें ये कदम उठाना पड़ता है।

ना हमें उन्हें ऐसा करने के लिए बढ़ावा देना है, ना ही हमें उन्हें ऐसा करने देना चाहिए।

और अगर हम कुछ भी नहीं कर सकते, तो कम से कम उनके प्रति इतना नकारात्मक नहीं सोचना चाहिए, जितना सोचा जाता है।

क्योंकि उन्हें ऐसा करने का कोई शौक नहीं होता, और वे ऐसा तभी करते हैं जब उनके पास कोई भी अतिरिक्त विकल्प नहीं होता। यदि हम इतने सजग और समर्थ हों, तो हमें उन्हें इस स्थिति तक आने ही नहीं देना चाहिए।

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